नीमच। जिले में एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत हो रही पुलिस कार्रवाई भले ही सतही तौर पर सख्ती दिखा रही हो, लेकिन पर्दे के पीछे कुछ अधिकारियों की भूमिका खाकी की साख पर सवाल खड़े कर रही है। वर्षों से नीमच जिले में ही जमे एक चर्चित एएसआई लगातार विवादों में रहे हैं—कभी लोकायुक्त की रडार पर तो कभी NDPS मामलों में संदिग्ध भूमिका के चलते।
साठगांठ रही तस्करों से, अब बन बैठे “पाक-साफ”
सूत्रों के अनुसार, उक्त एएसआई पूर्व में कुख्यात तस्कर कमल राणा के मामले में भी संदिग्ध पाए गए थे, जिसे क्राइम ब्रांच ने महाराष्ट्र के शिर्डी से गिरफ्तार किया था। इस केस में कुल 6 पुलिसकर्मियों की भूमिका जांच के घेरे में आई थी, जिनमें एएसआई साहब का नाम भी प्रमुखता से था। हालांकि जोड़-तोड़ और ऊंची पहुंच के चलते वो हर बार खुद को पाक-साफ साबित कर लेते हैं।
दलाली, गठजोड़ और चौकियों पर “राज”
बताया जाता है कि एएसआई साहब का तस्करों से गठजोड़ सिर्फ “सहयोग” तक सीमित नहीं, बल्कि कई बार उनके लिए दलाली भी की गई। चौकी से चौकी घूमते हुए भी साहब को कभी जिले से बाहर नहीं किया गया। अफसरशाही में अपनी पैठ के दम पर अब खुद को जिले का मालिक समझने लगे हैं।
NDPS कार्रवाई सिर्फ प्रेस नोट तक सीमित?
जिले में लगातार NDPS एक्ट के तहत बड़ी कार्यवाहियों की खबरें आती हैं, लेकिन ज़्यादातर मामलों में आगे की जांच “अनुसंधान जारी है” के नाम पर अटक जाती है। ज़मीनी सच्चाई यह है कि केवल बिचौलियों पर कार्रवाई होती है, जबकि मुख्य सरगनाओं से “लेन-देन” के आरोप पुलिस पर बार-बार लगते आए हैं।
क्या होगी निष्पक्ष जांच….?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या जिले के ईमानदार पुलिस अधीक्षक इन गंभीर आरोपों का संज्ञान लेकर उच्च स्तरीय विभागीय जांच करवाएंगे? क्या ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई होगी जो वर्षों से सिस्टम को पंगु बना रहे हैं?
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