नीमच। देश में उभरती युवा पीढ़ी यानी जेन जी (Generation Z) अब केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद कर रही है। हाल ही में जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध में हुए आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया। इस आंदोलन के बाद केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि युवाओं की आवाज को अब नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
वरिष्ठ शिक्षाविद् डॉ. माधुरी चौरसिया का मानना है कि यह आंदोलन केवल नीट परीक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि उस पीढ़ी का आक्रोश था जो मेहनत के दम पर अपना भविष्य बनाना चाहती है, लेकिन बार-बार व्यवस्थागत खामियों का सामना कर रही है।
उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर से शुरू हुई यह चेतना अब देशभर में दिखाई दे रही है। झारखंड के छात्र आंदोलन, भोपाल में नर्सिंग छात्रों का प्रदर्शन तथा विभिन्न स्थानों पर स्कूली बच्चों द्वारा अपनी समस्याओं को लेकर किए जा रहे आंदोलन इस बदलाव के संकेत हैं।
डॉ. चौरसिया के अनुसार राजनीतिक दल भी समझ चुके हैं कि डिजिटल युग की यह पीढ़ी केवल चुनावी नारों से प्रभावित नहीं होगी। यही कारण है कि आगामी 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में भी युवाओं और उनके भविष्य से जुड़े मुद्दों पर विशेष ध्यान रहने की संभावना जताई जा रही है।
उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में देश में लगभग 38 करोड़ युवा मतदाता जेन जी की सोच से जुड़े होंगे। यह वर्ग सोशल मीडिया पर अपनी राय खुलकर रखता है और जरूरत पड़ने पर लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन भी करता है। ऐसे में केवल जाति, धर्म या मुफ्त योजनाओं के आधार पर राजनीति करना पहले जितना प्रभावी नहीं रहेगा। आज का युवा रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट और पारदर्शी व्यवस्था जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर जवाब चाहता है।
डॉ. चौरसिया का कहना है कि विभिन्न राजनीतिक दल भी युवाओं तक पहुंचने के लिए नई रणनीतियां अपना रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी युवाओं की बात सुनने और उन्हें संगठन से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया है। वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) भी युवाओं को जोड़ने के प्रयास कर रही है। दूसरी ओर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार छात्रों के बीच पहुंच रहे हैं, जबकि कांग्रेस सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और छात्र संवाद जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं से जुड़ने की कोशिश कर रही है। अन्य क्षेत्रीय दल भी युवा मतदाताओं पर विशेष फोकस कर रहे हैं।
डॉ. चौरसिया के अनुसार वर्ष 2027 में सात राज्यों के विधानसभा चुनाव तथा 2029 के लोकसभा चुनाव में जेन जी की भूमिका निर्णायक हो सकती है। उनका मानना है कि राजनीतिक दलों को अपने घोषणा पत्रों में शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और युवाओं की भागीदारी को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही योग्य युवाओं को चुनावी टिकट देकर नेतृत्व में भी स्थान देना होगा।
उन्होंने कहा कि अब जेन जी केवल चुनावी वादों को सुनने वाली पीढ़ी नहीं रही, बल्कि वह चुनावी परिणाम तय करने की क्षमता रखने वाली नई राजनीतिक शक्ति बनकर उभर रही है।
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